जैसा की हम सभी जानते हैं और सुनते आए हैं के मनुष्य शरीर सारे शरीरों मे श्रेष्ठ है । (बड़े भाग मानुष तनु पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।)
इसे सुर (देवता) दुर्लभ कहा गया है । क्यू की इसी शरीर मे साधना का धाम है ।
(साधन धाम मोक्ष कर द्वारा )
जीतने भी देवी देवता हैं वो देव शरीर मे अपने पुण्य के कारण है , कहा गया है की पुण्य क्षिणे पुनः मृत्युलोके , अर्थात पुण्य भी हमारी पूंजी की तरह होते है जैसे ही क्षीण हो जाते याने उनका समय पूरा हो जाता उन्हे पुनः मृत्युलोक मे आना होता है । और मृत्युलोक मे 84 लाख योनियों मे केवल मनुष्य योनि ही कर्म योनि है बाकी सारी भोग योनि ।
बाकी सारी योनियों मे अपने पाप कर्मो के अनुसार कीड़े मकोड़े पशु पक्षी की योनि मिलती है ।
लेकिन मनुष्य शरीर कर्म योनि है अर्थात साधना कर के अच्छे कर्म कर के मनुष्य खुद को देवता भी बना सकता और उनसे ऊपर उठ कर मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है ।
इसी शरीर मे संभव है जीते जी । मरने के बाद जब ये शरीर ही नहीं रहेगा जो साधना का धाम है जिसे मानव मंदिर और जिस्मानी मस्जिद कहा गया वो ही नहीं होगी तो प्रभु दर्शन कैसे किए जाएँगे ।
एक और बात जो अंत मे काही जा रही लेकिन बहुत महत्वपूर्ण है वो ये की
कलियुग केवल नाम आधारा सुमिर सुमिर नर उतरही पारा , मतलब केलियुग मे केवल नाम का आधार है कलियुग मे जप तप एवं अन्य कर्म कांडों से पुण्य अर्जित किया जा सकता है लेकिन मोक्ष नहीं , मोक्ष प्राप्ति के लिए नाम ही आधार है ।
जीते जी ईश्वर के दर्शन करने के लिए नाम रूपी डोर से ही पार जाया जा सकता है । और ये नाम संतों द्वारा दिया जाता है ।
समय का जागृत संत केवल एक होता है ।
नाम रहे संतान आधिना संत बिना कोई नाम न दीन्हा ।
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